Madanlal Dhingra ki jivani

Madan lal Dhingra ki jivani

Madan lal Dhingra ki जीवनी, मदन लाल ढींगरा को हम  A lion hearted national hero Madanlal Dhingra के नाम से भी जाना जाता है। का जन्म 18 December 1883 में हुआ था ।

 

 

Madan lal Dhingra ki jivani in hindi

 

इनका प्रारम्भिक शिक्षा अमृतसर में हुई। और 1900 तक अमृतसर में ही पढ़े। फिर लाहौर चले गये। गवर्नमेंट काॅलेज लाहौर में पढ़ाई शुरू की। जहां प्राचार्य का विरोध करने के कारण काॅलेज से निकाल दिये गये । विरोध का कारण ब्रिटेन से मंगाया गया ब्लेजर का कपड़ा था। आयातित कपड़े का ढींगरा के नेतृत्व में छात्रों ने विरोध कर दिया था। उस समय वह एम.ए. की पढ़ाई कर रहे थे। स्वदेशी के आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने साथियों के साथ मिलकर ऐसा विरोध किया था।

 

 

उन्होंने भारत की गरीबी, भुखमरी, बीमारी, त्रासदी का गहराई से अध्ययन किया था।

इनका समाधान स्वराज ही था। गुलामी से मुक्ति को उन्होंने जीवन का लक्ष्य बना दिया था। इनके पिता अमीर थे। अंग्रजों की सेवा में थे। काॅलेज से निकाले गये तो पिता ने घर से भी निकाल दिया। ढींगरा ने एक छोटी नौकरी कर ली। क्लर्क बने गये। पर आजादी के दीवाने ढींगरा को समय न मिलता। इसलिए नौकरी छोड़ दी।

 

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कुछ दिन तांगा चलाया। एक तांगे वाले के नौकर बन गये थे। फिर इनके भाई को इन पर रहम आया। उन्होंने इन्हें पढ़ाई के लिए ब्रिटेन भेजवा दिया। वहां जाने के प्रबंध में डा. बिहारी लाल ने मदद की।

 

लन्दन में यूनिवर्सिटी कालेज में दाखिला मिल गया। यह बात 1906 की है। यहां मैकेनिकल इंजीनियरिंग का कोर्स करने के लिए दाखिला मिला था।

 

लन्दन में भारत से गये कुछ लोग दोस्त बन गये।

इनमें कई आजादी के आन्दोलन से प्रभावित थे।

वीर विनायक सावरकर से भी ढींगरा की भेंट हो गयी। उन्होंने ढींगरा को पक्का क्रांतिकारी, प्रचण्ड राष्ट्रभक्त बना दिया। उन्होंने हथियार चलाना, भाषण करना भी सिखाया। भारत की दुर्दशा का सच्चा वर्णन, अंग्रेजों की भारत को लूटने की नीतियों के ढींगरा मुखर आलोचक बन गये। मदन लाल ढींगरा का एक बड़ा समूह तैयार हो गया। इनमें सभी युवा थे। सभी मिलकर बैठकें करते ।

 

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भारत को आजादी दिलाने पर चर्चा करते। मदन लाल ढींगरा ने उस समय कर्जन को गोली मारी थी जब 1 july 1909 को इण्डियन नेशनल एसोसिएशन की एक सभा को सम्बोधित करने वह पहुंचा था।

 

कर्जन उस समय सेकेटरी आफस्टेट टू इण्डिया का प्रमुख सहायक था।

 

सभागार में जैसे ही कर्जन पहुंचा मदन लाल ने गोलियां चला दीं। पांच गोली मारी। इनमें चार उसके चेहरे पर लगीं। कोवास जी लाल काका नामक एक पारसी ने कर्जन को बचाने की कोशिश वह पांचवी गोली में मारा गया था। छठी गोली जो रिवाल्वर में बची थी उसे ढींगरा अपनी कनपटी में दागना चाहते थे। ताकि अंग्रेजों के अपवित्र हाथ उन्हें पकड़ न सके पर इसके पहले उन्हें घेरकर दबोच लिया गया था।

 

और जज के सामने पेश कर दिया गया। फांसी की सजा सुनाने वाले अंग्रेज जज ने मदद लाल ढींगरा से कहा – 

कोई अंग्रेजी कानून मैं नहीं मानता। अंग्रेजों की किसी अदालत को मेरे विरुद्ध सुनवाई करने या मुझे फांसी की सजा देने का कोई अधिकार नहीं है। अंग्रेजों ने मेरे देश पर कब्जा कर रखा है। अंग्रेज अपराधी हैं। हमारे देश को लूट रहे हैं । लुटेरों और अपने देश पर कब्जा करने वालों को मारने का मुझे अधिकार है। जैसे जर्मन अगर ब्रिटेन पर हमलावर हों तो अंग्रेज उन्हें मार डालेंगे। इसलिए मैंने कोई वकील नहीं किया। मैंने विलियम हट कर्जन बाटली को मार कर कोई गलती नहीं की। मैं अपनी मातृभूमि का पुजारी हूं। मेरी मातृभूमि पर हमलावरों का यही हस् होगा। मदद लाल ढींगरा ने जज को ललकारते हुए कहा अंग्रेजों ने हमारे देश भारत में 50 सालों में आठ करोड़ लोगों को मार डाला है। 

 

इतना ही नहीं हमारे देश की अमूल्य सम्पत्ति लूट ली है। हर साल 10 करोड़ पौण्ड धनराशि लूट कर ब्रिटेन ला रहे हैं।

हमारे देश के  राष्ट्रभक्त असंख्य लोगों को जेलों में बंद कर रहे हैं। उन्हें फांसी पर लटका रहे हो। तुम सब वही कर रहे हो जो एक लुटेरा करता है। एक आक्रमणकारी से अपने देश और उसकी सम्पत्ति को बचाना क्या अपराध है। अगर यह अपराध है तो सजा मुझे नहीं तुम अंग्रेजों को मिलनी चाहिए। भारत में जहां भी तुम्हारे लोग मिलें उन्हें लुटेरा समझकर खदेड़ देना चाहिए। जैसे तुम अंग्रेजों का मानना है कि जर्मन लोगों को तुम्हारे देश पर कब्जा करने, लूटने का अधिकार नहीं है। तुम्हारे लोगों को जर्मन मारेंगे तो क्या तुम उन्हें छोड़ देगे। उसी तरह तुम्हें भारत में आक्रमण और लूट की सजा मिलनी चाहिए।

 

अंग्रेजों तुम अपनी अदालत लगाकर मुझे सजा सुना रहे हो।

एक दिन भारत का हर बच्चा तुम्हें सजा देगा। तुम हमारे देश से हट जाओ अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब एक – एक अंग्रेज प्राणों की भीख मांगेगा।

 

मदद लाल ढींगरा ने अंग्रेज जज से पूछा – बताओ अगर आज मेरी तरह तुम्हारे किसी अंग्रेज भाई ने किसी जर्मन को गोली मारी होती तो क्या तुम उसे इस तरह अदालत लगा कर सजा सुनाते। तुम्हारी यह अदालत एक ढोंग है। लुटेरों का न्याय है। मैं यह बयान आज तुम्हारी अदालत में खड़े होकर दया की भीख मांगने के लिए नहीं दे रहा। मैं नहीं चाहता तुम मुझे पहले से सोचकर रखी गयी मौत की सजा को बदल दो। मैं तुम्हें आगाह कर रहा हूं कि जो कुछ तुम कर रहे हो उसके बहुत गंभीर परिणाम होंगे। अंग्रेज अब भारत में रह नहीं  पाएंगे। वहां से तुम्हें दुम दबाकर भागना पड़ेगा। अन्यथा सबके सब मारे जाओगे। मैं सुनने को बेताब हूं तुम मुझे मौत की सजा सुनाओ। मुझे फांसी दो।

मेरे कुछ अनमोल विचार

 

 

मेरे कुछ अनमोल विचार 

 

 

भारत माता की जय की मेरी अंतिम हुंकार हर भारतीय के कानों में गूंज उठेगी। तब तुम्हें पता चलेगा कि भारत की आत्मा तुम्हें धिक्कार रही है। मैंने सोच समझ कर जो किया ठीक किया। मैं भारत मां का सच्चा सपूत हूं। तुम हत्यारे और लुटेरे हो। तुम्हें मैं अपनी सफाई नहीं दे रहा, तुम्हें तुम्हारी गुनाह बता रहा हूँ।

 

अंग्रेज जज ने एक ही दिन में सारी सुनवाई पूरी करके मदन लाल ढींगरा को मौत की सजा सुना दी थी।

सुनवाई के दौरान उन्होंने माना कि वह लाला काका को मारना नहीं चाहते थे। पर वह बीच में आ गया। उन्हें 17 अगस्त 1909 को फांसी पर लटका दिया गया था। ढींगरा को फांसी देने के बाद उनका मृत शरीर लेने से उनके संबंधियों ने मना कर दिया था। बाद में उनके अवशेष भारत लाये गये। 13 December 1976 को अकोला महाराष्ट्र में उनका छोटा सा स्मारक बनाया गया। भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों के लिए मदन लाल ढींगर का जीवन आदर्श बन गया था।

 

 

समाप्त

 

 

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Author: Kumar

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